तर्जः वीर प्रभु का है कहना…
महावीर का है सन्देश,
चलो भव्य अब अपने देश।
मुक्तिपुरी है अपना देश ।। टेक ।।
अपना देश बिना पहिचाने,
सहे बहुत भव-भव के क्लेश।
स्वर्गादिक के वैभव पाये,
तो भी पाया सुख नहिं लेश।। 1।।
अब सुन्दर अवसर है आया,
धारो-धारो निर्ग्रन्थ वेश।
पर द्रव्यों से प्रीति छोड़ो,
लाओ नहीं राग या द्वेष।। 2।।
समता भाव सहज ही धारो,
जासे मिटे सर्व संक्लेश।
ऐसा आतम ध्यान लगाओ,
कर्मबन्ध होवें निःशेष ।। 3 ।।
रत्नत्रय ही उत्तम साधन,
साधो मुक्ति साध्य विशेष ।
दुखमय आवागमन निवारो,
विलसो परमानन्द हमेश।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ११५ से ११६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’