त्रिभुवनआनन्दकारी जिन छवि, थारी नैननिहारी ।।टेक।।
ज्ञान अपूरब उदय भयो अब, या दिनकी बलिहारी ।
मो उर मोद बडो जु नाथ सो, कथा न जात उचारी ।।१।।
सुन घनघोर मोरमुद ओर न, ज्यों निधि पाय भिखारी ।
जाहि लखत झट झरत मोह रज, होय सो भवि अविकारी ।।२।।
जाकी सुंदरता सु पुरन्दर-शोभ लजावनहारी ।
निज अनुभूति सुधाछवि पुलकित, वदन मदन अरिहारी ।।३।।
शूल दुकूल न बाला माला, मुनि मन मोद प्रसारी ।
अरुन न नैन न सैन भ्रमै न न, बंक न लंक सम्हारी ।।४।।
तातैं विधि विभाव क्रोधादि न, लखियत हे जगतारी ।
पूजत पातकपुंज पलावत, ध्यावत शिवविस्तारी ।।५।।
कामधेनु सुरतरु चिंतामनि, इकभव सुखकरतारी ।
तुम छवि लखत मोदतैं जो सुर, सो तुमपद दातारी ।।६।।
महिमा कहत न लहत पार सुर, गुरुहूकी बुधि हारी ।
और कहै किम ‘दौल’ चहै इम, देहु दशा तुमधारी ।।७।।
ओर = अन्त, मोड़ ।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १६ से १७
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