त्रिभुवनआनन्दकारी जिन छवि, थारी नैननिहारी | Tribhuvanaanandakari Jin Chhavi Thari Nainanihari

त्रिभुवनआनन्दकारी जिन छवि, थारी नैननिहारी

त्रिभुवनआनन्दकारी जिन छवि, थारी नैननिहारी ।।टेक।।

ज्ञान अपूरब उदय भयो अब, या दिनकी बलिहारी ।
मो उर मोद बडो जु नाथ सो, कथा न जात उचारी ।।१।।

सुन घनघोर मोरमुद ओर न, ज्यों निधि पाय भिखारी ।
जाहि लखत झट झरत मोह रज, होय सो भवि अविकारी ।।२।।

जाकी सुंदरता सु पुरन्दर-शोभ लजावनहारी ।
निज अनुभूति सुधाछवि पुलकित, वदन मदन अरिहारी ।।३।।

शूल दुकूल न बाला माला, मुनि मन मोद प्रसारी ।
अरुन न नैन न सैन भ्रमै न न, बंक न लंक सम्हारी ।।४।।

तातैं विधि विभाव क्रोधादि न, लखियत हे जगतारी ।
पूजत पातकपुंज पलावत, ध्यावत शिवविस्तारी ।।५।।

कामधेनु सुरतरु चिंतामनि, इकभव सुखकरतारी ।
तुम छवि लखत मोदतैं जो सुर, सो तुमपद दातारी ।।६।।

महिमा कहत न लहत पार सुर, गुरुहूकी बुधि हारी ।
और कहै किम ‘दौल’ चहै इम, देहु दशा तुमधारी ।।७।।

ओर = अन्त, मोड़ ।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १६ से १७

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अर्थ

जो अब से पहले कभी नहीं हुआ था, वह ज्ञान मुझे अब हुआ है। आज का दिन श्रेष्ठ है, बलिहारी है, समर्पण है इस दिन के प्रति। मेरे हृदय में जो आनन्द उमड़ रहा है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

जिस प्रकार बादलों की गरज से मोर मुदित हो जाते हैं; प्रसन्न हो जाते हैं, उसकी प्रसन्नता का कोई अन्त ही नहीं रहता; जैसे भिखारी को धन प्राप्ति से प्रसन्नता होती है उसी प्रकार जिनेन्द्र के दर्शन से तुरन्त ही मोहरूपी धूल झड़ जाती है अर्थात् मोह का नाश होता है और भव्यजनों के समस्त विकार नष्ट हो जाते हैं। जिनकी सुन्दरता को देखकर इन्द्र भी लजाता है, ऐसी अद्भुत सुन्दरता के धारी आपके दर्शनकर अपनी अनुभूति/स्वानुभूति अमृतरस सी उमड़ने लगती है, जो कामदेव जैसे शत्रु को भी पराजित करती है। आपके पास/साथ न कोई त्रिशूल है, न वस्त्र है, न कोई स्त्री है और न कोई माला है, फिर भी आपकी मुद्रा मुनियों के मन को आनन्द से भरनेवाली है/आनन्द देनेवाली है। जिसके क्रोध से नेत्र लाल नहीं है अर्थात् जिनके क्रोध नहीं है, न कोई चिह्न है और न कोई भ्रम या धोखा और न शरीर की कोई टेढ़ी चितवन है। हे जगतारी ! इस प्रकार आपके कोर्ड क्रोध आदि विभाव भी दिखाई नहीं देते, आपकी पूजा से पाप के ढेर भी नष्ट हो जाते हैं, हट जाते हैं और ध्यान से मोक्ष की ओर विस्तार होता है। कामधेनु, कल्पवृक्ष और चिन्तामणिरत्न केवल एक भव को ही सुखी बनानेवाले हैं किन्तु आप महान दानी हैं। आप ऐसे दातार हैं कि जो प्रसन्नता से आपकी छवि लखता है आप उन्हें अपने समान पद प्रदान कर देते हैं। देवगण भी आपकी महिमा का वर्णन नहीं कर पाते, देवताओं के गुरु बृहस्पति भी आपकी महिमा का वर्णन करने में सक्षम नहीं। दौलतराम कहते हैं कि मैं आपसे इसके अलावा क्या बाहूँ कि मुझे आपके समान पद की प्राप्ति हो।

शब्दार्थ: ओर = अन्त, मोड़।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पद 1।

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