स्वानुभव के बिना | Swanubhav Ke Bina

स्वानुभव के बिना, भ्रमता ही फिरा हूँ मैं।
चहुँ गति में सदा, रूलता ही रहा हूँ मैं॥
कभी इस भव में, कभी उस भव में भ्रमता ही फिरा हूँ मैं ॥टेक॥

कभी स्वर्ग गया, कभी नर्क गया।
कभी मानव बना, कभी तिर्यंच बना।।-²

कभी भोगों में, कभी रोगों में रुलता ही रहा हूँ मैं।
स्वानुभव के बिना भ्रमता ही रहा हूँ मैं।।

निज आतम को कभी जाना नहीं।
निज परमातम पहचाना नहीं।।

कभी शास्त्रों को, कभी सूत्रों को, रटता ही रहा हूँ मैं।
स्वानुभव के बिना भ्रमता ही रहा हूँ मैं।।

नरतन है मिला, जिनधर्म मिला।
सद्गुरु अरु, धर्म आगम मिला।।-²

अब चेत संभलकर, अब समकित पाके
मुक्ति को चलूँगा मैं।
स्वानुभव के बिना भ्रमता ही रहा हूँ मैं।।

चहुँ गतियों में इन कर्मों में भ्रमता ही रहा हूँ मैं।
स्वानुभव के बिना भ्रमता ही रहा हूँ मैं।।

Artist, Lyrics: Pt. Bharat Bhai Mehta ‘Gyayak’

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