ज्ञान सुधारस पीजे रे भाई, सुधारस पीजे रे।
जन्म-जरा-मृत रोग मेटिके, काल अनन्त सु-जीजे ।। टेक ।।
ज्ञान बिना भव-भव भटकाए, अब तो कछु सुधि लीजे ।
महाभाग्य जिनशासन पाया, निज आतम हित कीजे ।। 1 ।।
करो-करो तत्त्वों का निर्णय, भेद-विज्ञान करीजे ।
रागादिक से भिन्न ज्ञानमय, आतम अनुभव कीजे ।। 2।।
दुखमय विषय-कषाय परिग्रह, स्वाश्रय से तज दीजे।
हो निर्ग्रन्थ आत्म पद साधो, अवसर का फल लीजे ।। 3।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’