ज्ञायक का ही आश्रय होवे, यही जगत् में सार रे | jjayaka ka hi ashraya hove yahi jagata mem sara re

ज्ञायक का ही आश्रय होवे, यही जगत् में सार रे

ज्ञायक का ही आश्रय होवे, यही जगत् में सार रे ।
निज ज्ञायक ही मंगल उत्तम शरणभूत सुखकार रे ।।टेक।।

क्षणिक परिणति में तन्मय हो, भूल गया ध्रुव ज्ञायक को,
पुण्य-पाप में अटका-भटका, सुख माना दुःख दायक को ।
इसीलिये चेतन! गति-गति में सही दुःखों की मार रे ।।1।।

पर को साधक-बाधक माने, ये तो तेरी भूल है,
मिथ्या श्रद्धा और कषायें ही शिवपथ में शूल हैं ।
पर पदार्थ तो भिन्न सदा ही, मोह राग संसार रे ।।2।।

‘मैं त्रिकाल ज्ञायक हूँ’ श्रद्धा अरु में ही अनुभूति हो,
चिन्तन रूप विकल्प न आवे, यहीं पूर्ण स्थिरता हो ।
ये ही निश्चय रत्नत्रय ले, जावे भव से पार रे ।।3।।

जो भी सुखी हुए हैं होंगे, निज ज्ञायक आधार से,
डूबे, डूब रहे, डूबेंगे प्राणी पर आधार से ।
निज ज्ञायक प्रभु ही है अपना सच्चा तारणहार रे ।।4।।

अतः जिनागम को अभ्यासो, श्री गुरु का उपदेश सुनो,
युक्ति से सम्यक् निर्णय कर, स्वानुभूति प्रमाण करो ।
नहीं चूकना अरे! ‘आत्मन्’, यह अवसर सुखकार रे ।।5।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ९३ से ९४