सिद्ध प्रभु की भक्ति करते, हृदय हर्षित होता है | Siddh Prabhu Ki Bhakti Karate Hrday Harsit Hot Hai

सिद्ध प्रभु की भक्ति करते, हृदय हर्षित होता है।

आनंद उल्लसित होता है।।टेक।।

सिद्धों के गुण भरे हैं देखो,
सिद्धचक्र के पाठ में।
अपनी अपनी परिणति धोलो,
जिनवाणी के घाट में।।
जिनवाणी अभ्यास किये से,
भेदविज्ञान सु-होता है।।1।।

हैं प्रतिबिम्ब समान सिद्धप्रभु,
निज स्वरूप दर्शाने में।
निमित्तभूत हैं पुरुषार्थी को,
निज प्रभुता प्रगटाने में ।।
सिद्ध समान स्वरूप का ध्याता,
स्वयं सिद्ध सम होता है।।2।।

तुम रागों में अटक न जाना,
स्वयंसिद्ध प्रभु पहिचानो ।
जैसे गुण सिद्धों के गाओ,
वैसे ही अपने जानो ।।
जब निज की महिमा आवे,
तब सम्यक्दर्शन होता है ।।3।।

सम्यग्दर्शन होने पर ही,
साधक दशा प्रगट होती।
क्षण-क्षण बढ़ती वीतरागता,
सहज ही साधु दशा होती ।।
शुक्ल ध्यान में कर्म नशावें,
अविनाशी शिव होता है।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७५ से २७६