ज्ञेय प्रतिभासें तो प्रतिभासें, मुझे ज्ञायक ही अनुभव में आवे ।
ज्ञायक ही रुचि से अनुभवते, परमानन्द प्रगटावे ।। टेक।।
घटपटादि को सूर्य प्रकाशे, छोड़ बुद्धि तू ऐसी ।
घटपटादि भी सूर्य प्रकाशे, बात समझ तू ऐसी ।।
घट-पदादि हों गौण अहो, फिर एक सूर्य दिखलावे ।
कैसे गौण करें ज्ञेयों को, ज्ञायक अनुभव आवे।। 1।।
ज्ञायक करे प्रसिद्ध ज्ञेय को, बहिर्दृष्टि हो इसमें ।
ज्ञेय भी ज्ञायक को प्रसिद्धते, अन्तर्दृष्टि हो इसमें ।।
निज ज्ञायक के अनुभव की फिर, सहज विधि बन जावे ।
ज्ञायक की दृष्टि होते ही, रोम-रोम हरषावे ।। 2 ।।
ज्ञेयों की रुचि के कारण ही, ज्ञान में ज्ञेय दिखावें ।
किन्तु ज्ञेय तो रहें ज्ञेय में, ज्ञान में कैसे आवें ।।
ज्ञेयों का प्रतिबिम्ब, ज्ञान का बिम्ब, ज्ञान में आवे ।
परम सत्य अन्तर अनुभव कर, जाननहार जनावे ।। 3 ।।
जाननहार जनावे ऐसी भेदबुद्धि फिर तजना ।
जाननहार हूँ सहजपने यों, ध्येय रूप में रमना ।।
ध्येयमयी इस आत्मध्यान से, सकल कर्म नश जावे ।
निश्चित अल्पकाल में ही, भवमुक्त सिद्धपद पावे ।। 4 ।।
रचयिता - बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्
Source - जिनवर गुणगान