सुनो प्रभु जी अरज हमारी, मेरा काज तुमसे अटका | Suno Prabhu Ji Araj Hamari, Mera Kaaj Tumse Atka

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सुनो प्रभु जी, अरज हमारी, मेरा काज तुमसे अटका।

भव सागर में रुला फिरा हूँ, लाख चौरासी में भटका।
गर्भ वेदना सही जो मैंने, औंधे मुँह करके लटका।
गर्भ कूप से मुझे निकाला, फेर जमीं पर धर पटका।।1।।

बालापन अरु तरुण अवस्था, वृद्धपने का है झटका।
तीनों पन मैंने यों ही खोए, पाप किये आया अटका।।2।।

दीन दयाल दयानिध स्वामी, चरण शरण का है चसका।
हाथ जोड़ मैं करूँ बीनती, यही मिटा मेरा खटका।।3।।

रचयिता : अज्ञात
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस

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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।