सरसब्ज उजड़ते देखे हैं, उजड़ों को भी बसते देखा है | Sarsabz Ujadte Dekhe Hain, Ujado Ko Bhi Baste Dekha Hai

प्रूफरीडिंग बाकी है
ये बोल रिकॉर्डिंग से मशीन द्वारा लिखे गए हैं, इनमें अशुद्धियाँ हो सकती हैं।

सरसब्ज उजड़ते देखे हैं, उजड़ों को भी बसता देखा है।
जो आज अकड़ता है उसका, कल हाल सिसकता देखा है।।

धन की मस्ती में आकर के, सीधे से बात नहीं करते।
उनको गरीबी में हमने, दानों को तरसता देखा है।।1।।

कंगना न खुला, मेहंदी न छुटी, दुल्हन का न जिसने मुँह देखा।
दुल्हन को बिलखती छोड़ उसे, अर्थी पर कसता देखा है।।2।।

सुन राज तिलक की तैयारी, हर चेहरे पे नूर बरसता था।
होते ही फज़र इन आँखों से, सावन सा बरसता देखा है।।3।।

रचयिता : अज्ञात
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस

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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।

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