तर्ज : मनुआ मन की घुंडी खोल …
शुद्ध-बुद्ध है रूप तुम्हारा, पर भावों से अति ही न्यारा,
चेतन अपनी ओर निहारो, तुम हो स्वयं सिद्ध भगवान्।
तुम हो गुण अनंत की खान।। टेक ।।
जग से अनुपम विभव तुम्हारा, श्री सर्वज्ञ अनंत निहारा।
तुम हो लोकोत्तम परधान।। 1।।
भूल स्वयं को क्यों दुख पाओ, समझो समझो निज घर आओ।
विलसो ज्ञानानन्द महान्।। 2।।
सार नहीं कुछ है बाहर में, अक्षय प्रभुता है अन्तर में।
पाओ रत्नत्रय अम्लान।। 3 ।।
उत्तम अवसर चूक न जाना, करो स्वानुभव हो कल्याणा।
धारो निर्ग्रन्थ रूप महान्।। 4।।
आत्मध्यान से कर्म नशाओ, निजानंदमय शिवपद पाओ ।
जग में कहलाओ भगवान् ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३७१ से ३७२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’