ज्ञानाभ्यास करो मुक्तिमार्ग मिले | j nanabhyasa karo muktimarga mile

तर्जः अमृत से गगरी भरो…

ज्ञानाभ्यास करो मुक्तिमार्ग मिले।
मिथ्या मोह तजो, संकट सब ही टलें ॥ टेक ॥
आतम देखन-जानन हारा, शाश्वत गुण अनंत भंडारा।
प्रत्यक्ष अनुभव करो, सम्यक् भाव जगे ॥ 1 ॥

भाओ नित वैराग्य-भावना, वीतरागता सहज साधना ।
अरु पुरुषार्थ करो, समता भाव बढ़े ॥ 2 ॥

छोड़ों पर की मिथ्या आशा, देव-धर्म-गुरु का विश्वासा।
अन्तर माँहि जगे, जगत् असार दिखे ॥ ३॥

पर का तो किंचित् नहीं दोष, व्यर्थ करे तू राग अरु रोष।
ज्ञाता भाव धरो, निज पद सहज मिले ॥ 4 ॥

गुरुवर का उपदेश सुहाना, आत्मन् अवसर चूक न जाना।
आतम ध्यान धरो, कर्म कलंक जले ॥ 5 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३९० से ३९१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’