ज्ञानी का धन ज्ञान । Gyani Ka Dhan Gyan

ज्ञानी का धन ज्ञान जगत में, ज्ञानी का धन ज्ञान॥टेक॥

पाप न भाए, पुण्य न भाए, नित्य निरंजन रूप रमाए।
चक्रवर्ती की संपत्ति भी गर, मिले तो धूल समान॥जगत में…॥1॥

तीव्र उदय तद्रूप बने, घोर दु:ख सु:ख सहे घने।
फिर भी पर को पर ही जाने, सुवरण अग्नि समान॥जगत में…॥2॥

ज्ञान बिना तो स्वर्ग बला है, ज्ञान होय तो नर्क भला है।
कर्म शैल के चूर करन को, ज्ञान ही वज्र समान॥जगत में…॥3॥

ज्ञान को धारे ज्ञान का धारी, ज्यों सिर गगर धरे पनिहारी।
चंचल चाल करे बहु बातें, चंद्र गगर पर ध्यान॥जगत में…॥4॥

Artist- कवि पथिक जी