तर्जः शोभे समवशरण सुखकार प्रभु का …
शोभे प्रभु स्वरूप अविकार ।
निज स्वरूप देखन को निर्मल दर्पण सम सुखकार ।। टेक ।।
दर्शन-ज्ञान अनन्त सु शोभें, सुख भी अनंत अपार ।
वीर्य अनन्त प्रगट भयो स्वामी, प्रभुता को नहीं पार।। 1 ।।
ज्ञाता-दृष्टा रहो सहज ही, नहीं कर्तृत्व विकार।
अहो ! परम निर्दोष जिनेश्वर, नहीं रागादि लगार।। 2।।
इन्द्रादिक चरणों में नत हैं, महिमा अपरम्पार ।
वंदन स्तुति भेदज्ञान कर, लहें आनंद अपार ।। 3।।
सहज चतुष्टयवन्त पूज्य प्रभु, चित्स्वरूप अविकार।
लख अन्तर में सहजपने ही, होय नमन सुखकार।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३७ से ३८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’