सुनि सुनि हे साथनि! म्हारे मनकी बात ।
सुरति सखीसों सुमति राणी यों-कहै जी ।
वीत्यो है साथनि म्हारी! दीरघकाल,
म्हारो सनेही म्हारे घर ना रहै जी ।।
ना बरज्यो रहै साथनि म्हारी चेतनराव,
कारज अधम अचेतनके करै जी ।
दुरमति है साथनि म्हारी जात कुजात,
सोई चिदातम पियको चित्त हरै जी ।।१।।
सिखयौ है साथनि म्हारी केती बार,
क्यों ही कियो हठी हठ एरी हरै जी ।
कीजे हो साथनि म्हारी कौन उपाय,
अब यह विरह विथा नहिं सही परै जी ।।२।।
चलि चलि री साथनि म्हारी,
जिनजीके पास, वे उपगारी इसैं समझावसी जी ।
जगसी हे सखी म्हारे मस्तक भाग,
जो म्हारौ कंथ समझि घर आवसी जी ।।३।।
कारज हे सखी म्हारी! सिद्ध न होय,
जब लग काल-लबधिबल नहिं भलो जी ।
तो पण हे सखी म्हारी उद्यम जोग,
सीख सयानी ‘भूधर’ मन सांभलो जी ।।४।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ ११२ से ११३
