शांति सुधा बरसा गये गुरु दोई बिरियां ।
समयसार समझा गये गुरु दोई बिरियां ॥
दोई बिरियां गुरु दोई बिरियां ॥ टेक ॥
श्वेताम्बर मत छोड़, दिगम्बर पथ भाया।
आतम धरम महान, समझकर समझाया ॥
स्वयं सिद्ध भगवान, सहज अनुभव आया।
जिन शासन का मर्म गुरु ने बतलाया ॥
सब भूले भगवान, कहें गुरु दोई बिरियां ॥1 ॥
सीमंधर संदेश सुनाने आये थे।
भरत क्षेत्र के भाग्य जगाने आये थे ॥
जीवराज जिनराज बताने आये थे।
शुद्ध बुद्ध के गीत आपको भाये थे ॥
कुंदकुंद के नंदन वंदौ दोई बिरियां ॥2॥
पावन चेतन रत्न गुरुजी आनंद भवन।
धन्य गुरु की द्रव्य दृष्टि जो लगी लगन ॥
धन्य साधना भूमि सोनगढ़ का कण-कण।
धन्य हो गया भारत सारा जगन मगन॥
अंतर आतम बह्न बताये गुरु दोई बिरियां ॥3 ॥
तीर्थंकर का भी विरह हमें नहीं साला।
गुरुदेव ने गूथा पंचरत्न की माला ॥
एकत्व विभक्त स्वरूप कुंद ने गाया।
गुरुदेव ने उसका हार्द हमें समझाया ॥
क्यों पहिन रहा है पाप-पुण्य की माला।
सर्वज्ञ का पंथ तो जग से रहा निराला ॥4॥
ध्रुव और अध्रुव पर्याय यही जिन गाया।
निज भवन मांहि देखो रत्नत्रय भाया ॥
अपने पुरुषार्थ से पाओ सम्यक् माला ॥
परमागम मंदिर बना आज गुरु शाला ॥5॥
‘आचार्य कुंद’ ने मंदिर ‘समय’ बनाया।
‘अमृत’ ने उस पर, कंचन कलश चढ़ाया ॥
‘गुरुदेव’ ने उस पर, पचरंगा फहराया।
यह विजय पताका देख जगत हर्षाया ॥6॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन