हो भैया मोरे! कहु कैसे सुख होय | Ho Bhaiya More! Kahu Kaise Sukh Hoy

हो भैया मोरे! कहु कैसे सुख होय

हो भैया मोरे! कहु कैसे सुख होय …
लीन कषाय अधीन विषयके, धरम करै नहिं कोय॥हो भैया. ॥

पाप उदय लखि रोवत भोंदू!, पाप तजै नहिं सोय।
स्वान-वान ज्यों पाहन सूंघे, सिंह हनै रिपु जोय ॥हो भैया. ॥१॥

धरम करत सुख दुख अघसेती, जानत हैं सब लोय।
कर दीपक लै कूप परत है, दुख पैहै भव दोय ॥हो भैया. ॥२॥

कुगुरु कुदेव कुधर्म लुभायो, देव धरम गुरु खोय।
उलट चाल तजि अब सुलटै जो, ‘द्यानत’ तिरै जग-तोय ॥हो भैया. ॥३॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ६२

अर्थ

ओ मेरे भाई ! बता, सुख किस प्रकार हो! कषायों से ग्रस्त व इन्द्रिय-विषयों में आसक्त जीव कोई धर्म-साधन नहीं करता तब उसे सुख किस प्रकार हो सकता है? अरे भोंदू (नासमझ) ! जब पापोदय होता है, तब तू रोता है, परन्तु पाप की गैल को, पाप को छोड़ता नहीं है। तेरी आदत तो उस कुत्ते की भाँति हैं जो पहले शत्रु के पाँव को सूँघता रहता है, जबकि सिंह की आदत तो शत्रु को देखते ही उसे नष्ट करने की होती है। धर्म-साधन से सुख होते हैं और पाप से दुःख होता है, यह सब लोग जानते हैं, सर्वविदित है यह। अरे हाथ में दीपक लेकर भी यदि कोई कुएँ में गिरे तो वह इस भव व परभव दोनों में दुःख का भागी होता है। सच्चे देव, शास्त्र व गुरु का साथ छोड़कर कुगुरु, कुदेव, कुधर्म में तू अपने आपको भुला रहा है। द्यानतराय कहते हैं कि इस उल्टी चाल को छोड़कर अब यदि तू सीधी चाल चले, सम्यक् राह पर चले तो तू इस जग से पार हो सकेगा, तिर जावेगा।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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