समझो-समझो रे धरम को सार, सुखी तुम होवोगे | samajho samajho re dharama ko sara sukhi tuma hovoge

समझो-समझो रे धरम को सार, सुखी तुम होवोगे ।। टेक ।।

धर्म ही मंगल, धर्म ही उत्तम, धर्म शरण सुखकार।
धर्म कर्म-बंधन को गाले, ले जाए मुक्ति मँझार।। 1।।

धर्म तो वस्तु स्वभाव है, पर्यय तीन प्रकार ।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान अरु चारित्र सुख करतार ।। 2।।

सबसे पहले तत्त्वज्ञान से, निज की करो संभार।
निज के आश्रय से ही कर दो, रागादिक परिहार।। 3।।

वीतराग सर्वज्ञ देव अरु, जिनवाणी दुखहार ।
ज्ञान-ध्यान-तप लीन जो निर्ग्रन्थ गुरु आधार ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २५६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’