सुन जिन बैन, श्रवन सुख पायौ
सुन जिन बैन, श्रवन सुख पायौ ।।टेक।।
नस्यौ तत्त्व दुर अभिनिवेश तम, स्याद उजास कहायौ ।
चिर विसर्यौ लह्यौ आतम रैन ।।१।। श्रवन. ।।
दह्यौ अनादि असंजम दवतैं, लहि व्रत सुधा सिरायौ
धीर धरी मन जीतन मन ।।२।। श्रवन. ।।
भरो विभाव अभाव सकल अब, सकल रूप चित लायौ ।
दास लह्यौ अब अविचल जैन ।।३।। श्रवन. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ४५
अर्थ
अहो, आज मुझे अपने कानों से जिनेन्द्र भगवान के वचनों को सुनकर बहुत सुख प्राप्त हुआ है। जिनेन्द्र भगवान के वचनों को सुनकर मेरा तत्त्वसम्बन्धी मिथ्या मान्यता का अन्धकार दूर हो गया है, स्याद्वादरूपी उजाला प्रकट हो गया है और मैंने अनादिकाल से भूले हुए अपने आत्मसुख को भी प्राप्त कर लिया है। मैं अनादिकाल से असंयमरूपी अग्नि में जल रहा था, किन्तु आज मैंने उस अग्नि को व्रतरूपी अमृत ग्रहण करके ठण्डा कर दिया है और आज मेरे मन ने कामदेव को जीतने के लिए धैर्य धारण कर लिया है। कविवर दौलतराम कहते हैं कि जिनेन्द्र भगवान के वचनों को सुनकर आज मेरे सम्पूर्ण विभावो का अभाव हो गया है, मुझे अपना सम्पूर्ण स्वभाव दृष्टि में आ गया है और जैनत्व में अविचल श्रद्धान की प्राप्ति हो गयी है।
स्रोत: दौलत विलास।
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