आज का दिवस है मंगलकारी, मंगलकारी आनन्दकारी ।
हुई शास्त्र रचना सुखकारी ।। टेक ।।
पुष्पदंत और भूतबली मुनि, षट्खण्डागम शास्त्र बनाया।
श्री धरसेनाचार्य गुरु का, स्वप्न अहो साकार कराया।। 1।।
स्वयं सिद्ध यह विश्व बताया, वस्तु स्वभाव धर्म दर्शाया।
तत्त्वार्थों का बोध कराया, मोक्षमार्ग में हमें लगाया।। 2।।
जलें दीप से दीप सुहाई, परम्परा त्यों चलती आई ।
हमने भी जिनशासन पाया, परमानंद अंतर उमगाया।। 3।।
श्रुत पंचमी पर्व मनावें, जिनवाणी की भक्ति रचावें।
स्वाध्याय का नियम बनावें, सम्यक् सदाचार अपनावें ।। 4 ।।
भेदभाव हम सभी भुलावें, सहज धर्म वात्सल्य बढ़ावें।
निज स्वभाव का कर आराधन, उत्तम रत्नत्रय प्रगटावें ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३०३ से ३०४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’