तर्ज : सम्यक्ज्ञान बिना …
सम्यक्ज्ञान करो, सफल होय पर्याय ।।टेक ।।
अपना सुख तो अपने में ही, पर से कैसे पाय ?
विषय-कषाय तज धर्म सम्हारो, नातर फिर पछताय ।।। ।।
गुरु उपदेश सुनो मनथिर करि, भेदज्ञान उपजाय।
लगे असार विभूति जग की, आतम तत्त्व सुहाय।।2।।
छाँड़ि राग रुचि हो अन्तर्मुख, जाननहार जनाय।
आनंदमय निज अनुभव प्रगटे, सम्यक्दर्श उपाय।।3।।
सम्यक्चारित्र सहजपने फिर, जीवन में प्रगटाय।
निज स्वरूप में ही रम जावे, अचल सिद्धपद पाय।।4।।
भक्ति-भावना 213
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’