सत्य सनातन जैन धरम | satya sanatana jaina dharama

सत्य सनातन जैन धरम,

सबका प्यारा आत्मधर्म ।
परम अहिंसा रूप धरम,
कुन्दकुन्द का, वीर प्रभु का।।
ज्ञानानन्दमय आत्म-धरम,

जयवन्तो नित जैन धरम।। टेक ।।

नहीं किसी ने इसे बनाया,
अरहंतों ने मात्र बताया।
जिन-जिन ने समझा सुख पाया,
दुःखदाई भवफन्द मिटाया।।
प्राणीमात्र का जैन धरम ।। 1।।

परम पारिणामिक परमातम,
नित्य निरंजन चिन्मय आतम।
निरावरण निर्दोष
सदा,
जो पर रूप न होय कदा।।
ज्ञायक प्रभु दरशाय धरम।। 2।।

सम्यग्दर्शन
मंगलकारी,
सम्यक् ज्ञान सर्व दुःखहारी।
सम्यक् चारित्र नित अविकारी,
धर्मी गुण अनन्त का धारी।।
आत्माश्रय से होय धरम ।। 3।।

‘आत्मन्’ अवसर चूक न जाना,
भेदज्ञान की ज्योति जगाना।
शुद्धातम को ध्येय बनाना,
निर्मल ध्यान दशा प्रगटाना।।
विज्ञजनों
का यही धरम ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २५२ से २५३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’