हे ऋषभ जिनेश्वर ! अनाहारी पद पाऊँ ।। टेक ।।
देहादिक अति भिन्न दिखावें, निज में तृप्त रहाऊँ।
निजानंद अमृत रस पीते, दोष क्षुधादि नशाऊँ ।। 1 ।।
अनाहारी आतम स्वभाव ही, क्षण क्षण अपना भाऊँ।
भेदविज्ञानमयी शक्ति से, नहीं उपयोग भ्रमाऊँ ।।2।।
युक्ताहारी साधक होकर, अनाहारी ध्रुव ध्याऊँ।
हो परमार्थ भक्ति अन्तर में, समता तुम सम पाऊँ।।3।।
हरष-हरष प्रभुवर गुण गाऊँ, चरणों शीश नवाऊँ।
नहीं कामना कोई अन्य विभु, अक्षय पद विलसाऊँ । । 4 ।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’