सुनरे गँवार, नितके लबार, तेरे घट मँझार परगट दिदार
(सोरठ)
सुनरे गँवार, नितके लबार, तेरे घट मँझार परगट दिदार,
मत फिरै ख्वार उरझी को सुरझाले ॥ टेर ॥
तजि मन विकार, अनुभव कूं धार ।
कर बार बार निज विचार,
तू है समयसार अपने ही गुण गाले ॥ १ ॥
तूही भव स्वरूप, तुही शिव सरूप,
होके ब्रह्म रूप पड़ा नर्ककूप
विषयन के तूप सेती मन को हटाले ॥ २ ॥
कहै दास नैन आनंद दैन, सुन जैन वैन जासु होत चैन ।
तजि मोह सेन, नर भो फल पाले ॥ ३ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ११ (विभिन्न कवियों के भजन)
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