शुद्धात्म चेतन हूँ इस जग से न्यारा हूँ
मैं नित्य निरंजन हूँ, सब जाननहारा हूँ
मैं ज्ञाता दृष्टा हूँ चेतन चिद्रूपी हूँ
गुण ज्ञान अनंत सहित मैं सिद्ध स्परूपी हूँ
मैं अमल अखंड अतुल अविकल अविनाशी हूँ
अविकारी अजर अमर निज ज्योति प्रकाशी हूँ
रागादिक भाव मलिन मैं तो उजियारा हूँ ।। मैं नित्य निरंजन हूँ सब जाननहारा हूँ
मैं ज्ञानानन्द मयी अविकल अविनाशी हूँ
चैतन्य स्वरूपी हूँ परद्रव्य प्रभावी हूँ
परभावों में पडकर मैं निज को भूल गया
पुदगल की संपत्ति पा निज के प्रतिकूल गया ।
अब अपने को लख लूँ, मुनिगण का प्यारा हूँ । शुद्धात्म चेतन हूँ इस जग से न्यारा हूँ ।
है संग अचेतन का भव भव में भटका हूँ
पुदगल का रूप धरे चहुँगति में अटका हूँ
शुभ अशुभ विभाव किये आश्रव को अपनाया ।
संवर से दूर रहा, भव भव में दुख पाया ।
चौरासी लाख भटक थक थक के हारा हूँ ।। मैं नित्य निरंजन हूँ, सब जाननहारा हूँ ।
मिथ्यात्व महातम की छायी बदरी कारी
समकित की किरणों से आयेगी उजियारी
रतनत्रय धारूँ तो अंतर उजियारा हो
भव बंधन कट जायें दुख से छुटकारा हो
ज्योति झिलमिल चमके मैं अनुपम तारा हूँ । शुद्धात्म चेतन हूँ इस जग से न्यारा हूँ ।
स्रोत: अन्तर्ध्वनि पुष्प १ (अन्तर्ध्वनि पुष्प 1 - जैन स्वाध्याय सामग्री | Antardhvani Pushp 1)