हमारे ये दिन यों ही गये जी
हमारे ये दिन यों ही गये जी …
कर न लियो कछु जप तप जी, कछु जप तप, बहु पाप बिसाहे नये जी ॥हमारे. ॥१॥
तन धन ही निज मान रहे, निज मान रहे, कबहूँ न उदास भये जी ॥हमारे. ॥२॥
‘द्यानत’ जे करि हैं करुना, करि हैं करुना, तेइ जीव लेखेमें लये जी ॥हमारे. ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन १२३
अर्थ
ओह ! हमारा अब तक का समय निरर्थक ही गया। हमने कुछ भी जप-तप नहीं किया। कुछ जप-तप किया भी तो खूब नए-नए पाप ही उपार्जित किए हैं। तन-धन को ही अपना मानते रहे और उनको अपना मानकर कभी उनसे उदास नहीं हुए, विरक्त नहीं हुए। द्यानत्तराय कहते हैं कि जिन्होंने (जिन जीवों ने) करुणा धारण की है वे ही जीव आपने अपने लेखे में (गणना में) लिये हैं अर्थात् आपने उन्हीं पर ध्यान दिया है।
का घात ज्ञानी जीव सदैव दयालु होते हैं। आरम्भ (क्रिया) करने से परजींवों का होता है और क्रोध से स्वयं का घात होता है। ज्ञानी उन दोनों अवस्थाओं को टालते हैं, उनसे अपने को बचाते हैं अर्थात् वे निजघात व परघात दोनों को टालते हैं।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 274।
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