हे आत्मा परमात्मा, इस भव से पार उतर ले रे॥टेक॥
यह संसार असार बखाना, जिनवर की जिनवाणी।
लख चौरासी चक्कर में, घूमे वैरागी प्राणी रे।
अब छोड़ दे जड़ दोस्ती, अक्षय सुख रूप सुमर ले।
इस भव से पार उतर ले रे, हे आत्मा परमात्मा॥१॥
बेलगाम घोड़े सा मन, करता रहता मनमानी।
बीत रही जीवन की साँसें, ज्यों अंजुरी को पानी रे।
सद्ज्ञान के अनुपान से, कर्मों के पंख कतर ले।
इस भव से पार उतर ले रे, हे आत्मा परमात्मा॥२॥
काम क्रोध मद लोभ दंभ की, छा रही अँधियारी।
जा कंचन सी किरण तुम्हारी, कर ले सारी उजियारी रे।
तप त्याग की शुभ आँच से, कटेगा स्वर्ण उजर ले।
इस भव से पार उतर ले रे, हे आत्मा परमात्मा॥३॥
Artist: ज्ञात नहीं (ऑडियो में गायक का नाम नहीं है)
स्रोत: भजन की ऑडियो रिकॉर्डिंग से लिखित, जैसा गाया गया है।
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