सारा पुण्य पाप का खेल, जगत् में देखो आँख पसार | Sara Punya Paap Ka Khel, Jagat Me Dekho Aankh Pasar

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सारा पुण्य पाप का खेल, जगत् में देखो आँख पसार।
देखो आँख पसार, कर्म के बस में है संसार।।

पुण्य उदय इंद्रादिक देवा, भगवन ऋषभ करें सब सेवा।
पाप उदय से बारह मास नो, मिला नहीं आहार।।1।।

पाप उदय द्रौपदी महारानी, महल विराट भरा जा पानी।
चीर बढ़ा हो पुण्य उदय से, जाको पार न बार।।2।।

पुण्य उदय सीता जब आयो, अग्निकुंड जलसार बनायो।
पाप उदय रावण हर ले गयो, करती आहाकार।।3।।

मैना सब विद्या पढ़ आई, और दुष्ट कर्म कुष्टी संग ब्याही।
पुण्य उदय जब हुआ, बनी वो कोटी भट्ट पटनार।।4।।

जैसी करनी वैसी भरनी, मित्र बात यह हृदय धरनी।
फल पाते हैं सभी, अरे शुभाशुभ कर्मों के अनुसार।।5।।

रचयिता : अज्ञात
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस

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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।

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