सिद्ध भक्ति- कर्मों का जिसने नाश किया | Siddh Bhakti- Karmon Ka Jisane Nash Kiya

कर्मों का जिसने नाश किया, अंतर्पुरुषार्थ जगाया है।
तब जाके कहीं उन जीवों ने, अविनाशी सिद्ध पद पाया है।

हे मेरे प्रभु! हे सिद्ध प्रभु! तुम घाति अघाति विनाशे हो।
जब भी मैं तुमको देखता हूँ तुम मुझको प्रभु ही बताते हो।
अशरीरि हो सर्वज्ञ प्रभु तुम ज्ञान शरीरि कहलाते।
निज आतम को तुम सिद्ध किये इसलिए सिद्ध तुम कहलाते।
तुम सम ही मैं बन जाऊँ,
अंतर में बस थम जाऊँ,
इतनी सी है मुक्ति की विधिऽऽ
अंतर में मैं झूलूंगा,
आनंद में मैं फूलूंगा
इतनी सी है सुख की ये विधिऽऽ।।1।।

दुक्खों से भरा संसार यहां तुम झूम के सुख को पा ना सके।
तुम मुक्त हुए तो ऐसे कि संसार में वापस आ ना सके।
समकित दर्शन और ज्ञान अगुरुलघु में शोभित तुम फूल रहे।
अवगाहन वीरज सुक्षमत्व निर्बाधित सुख में झूल रहे।।
तुम जैसा ही बन जाऊँ,
अठ गुण मैं भी प्रगटाऊँ
इतनी सी है मुक्ति की विधिऽऽ
अंतर में जो झुलूँगा,
आनंद में मैं फूलूंगा
इतनी सी है सुख की ये विधिऽऽ।।2।।

सब संसारी यदि सुखी होते, क्यों सिद्ध प्रभु यहाँ से जाते।
थोड़ा सा भी यदि सुख लगता तो वापस लौट चले आते।
हे सिद्ध प्रभु तुम सुखी रहे क्यों मैं प्रभु होकर दुखी रहता।
तुम कहते हो भगवान् हूँ मैं, भगवान् सदा सुख में बहता।।
तुम सम ही मैं बन जाऊँ,
अंतर में बस थम जाऊँ
इतनी सी मुक्ति की विधिऽऽ
अंतर में मैं झूलूंगा,
आनंद में मैं फुलूँगा
इतनी सी है सुख की ये विधिऽऽ।।3।।

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