सो ज्ञाता मेरे मन माना | So Gyaata Mere man maana

सो ज्ञाता मेरे मन माना, जिन निज-निज पर-पर जाना || टेक ||

छहों दरव तैं भिन्न जान कै, नव तत्त्वनि तैं आना |
ताकों देखैं ताकों जानैं, ताहीं के रस साना || १ ||

कर्म शुभाशुभ जो आवत हैं, सो तो पर पहिचाना |
तीन भवन को राज न चाहैं, यद्यपि गाँठ दरब बहु ना || २ ||

अखय अनन्ती सम्पति विलसै, भव तन भोग मगन ना |
‘द्यानत’ ता ऊपर बलिहारी, सोई जीवन-मुकत भना || ३ ||

Artist- पं. द्यानतराय जी

Singer - Chaavi Jain

खोज: So Gyata Mere man mana

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अर्थ

हे आत्मन् ! वह ही ज्ञाता है, वह हीं मेरे मन को मान्य है, जो निज को निज और पर को पर जानता है।

वह आत्मा को छहों द्रव्यों में सबसे भित्र जानता है। नौ तत्त्वों से अन्य है ऐसा जानता है। उसको देखकर जो उसे (निज को) जानता है, उसी की अनुभूति में, रस में डूब जाता है, वह ही आत्म-स्वभाव को ध्याता है। निमग्न हो जाता है।

शुभ और अशुभ जो कर्म आते हैं, वे सब पर हैं, ऐसा वह जानता है। उसको तीन लोक की, राज्य की बांछा नहीं है। यद्यपि वह द्रव्य रूप में स्वयं अकेला है, सर्व परिग्रह से रहित है।

वह अपने में निमग्न होकर अपने स्वभाव की अनंत-अक्षय (क्षयरहित) संपदा का निश्चय से भोक्ता है, परन्तु इस देह-पर्याय के भोगने में विरक्त है, उसमें मग्न नहीं है।

द्यानतराय कहते हैं कि जन्म-मरण से मुक्त ऐसा जो ज्ञाता है वह इस जीवन में ही ‘मुक्त’ कहा जाता है, उस पर मैं बलिहारी जाता हूँ।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 152।

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