सब तत्त्वों में सार मेरा समयसार प्यारा
सब तत्त्वों में सार मेरा समयसार प्यारा ।
सब धर्मों का आधार मेरा समयसार प्यारा ।।टेक।।
ध्रुव अनन्त धर्मोंमय धर्मी, जाने सो तत्त्वों का मर्मी ।
विलसे विभव अपार, होता वह भव से पारा ।।1।।
वर्ते भदाभेद स्वरूप, युगपद् निर्विकल्प चिद्रूप ।
धरि अभेद की दृष्टि जाना मैं जाननहारा ।।2।।
नहीं मुक्त, नहीं है संसारी, सहज मुक्त प्रभुता है न्यारी ।
रहे सहज निर्मुक्त निजानन्द रस वेदनहारा ।।3।।
अहो! परम निरपेक्ष रहाय, सहज विश्व अपार तैराय ।
सहज अकारक सहजपने ही है तारण हारा ।।4।।
सहजपने ही वर्ते ज्ञान, सहजपने ही होवे ध्यान ।
ऐसी ही कोई अद्भुत महिमा को पावे पारा ।।5।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ९४ से ९५