अंतर्ध्वनि पुष्प -5
ज्ञान स्वरूपी चेतन अनुभव में आये रे²
समवशरण में देखो, जिनवर फरमायें रे
ज्ञानी जग में दीखते नहीं ज्ञान जग माहिं
मगन विषय सुख में रहें ऐसा संभव नाहिं
शुद्ध त्रिकाली ध्रुवता दृष्टि में आये रे
ज्ञान स्वरूपी चेतन…
पाप भाव को पाप तो जाने हैं सब लोय-²
पुण्य भाव भी पाप है जानें विरला कोय
पुण्य पाप दोनों में समभाव जगाये रे
ज्ञान स्वरूपी चेतन…
फैलेगा उपयोग तो क्षीण ज्ञान धन होय
जो उपयोग समेटते केवलज्ञानी होय
एक समय में सारा लोकालोक समाये रे
ज्ञान स्वरूपी चेतन…
प्राप्त करें वो शुद्धता जो शुद्धता लखायें
अनुभव करें अशुद्धता वो अशुद्धता पायें
कुंदकुंद हम सबको भगवान् बतायें रे
ज्ञान स्वरूपी चेतन…
सम्यक् विधि जो स्वयं को विधि से भिन्न लखायें
ज्ञान निधि उसको स्वयं ज्ञान माहिं झलकाये
ध्रुवता की प्रभुता का आनंद आये रे
ज्ञान स्वरूपी चेतन…
Artist: Pt. Sanjiv Ji jain, Usmanpur