ज्ञानी जीव-दया नित पालैं
ज्ञानी जीव-दया नित पालैं ।
आरंभ परघात होत है, क्रोध पात निज टालें ॥टेक॥
हिंसा त्यागि दयाल कहावै, जलै कषाय बदनमें ।
बाहिर त्यागी अन्तर दागी, पहुँचै नरक सदन में ॥
ज्ञानी जीव-दया नित पालैं ॥१॥
करै दया कर आलस भावी, ताको कहिये पापी ।
शांत सुभाव प्रमाद न जाकै, सो परमारथव्यापी ॥
ज्ञानी जीव-दया नित पालैं ॥२॥
शिथिलाचार निरुद्यम रहना, सहना बहु दुख भ्राता ।
‘द्यानत’ बोलन डोलन जीमन, करें जतनसों ज्ञाता ॥
ज्ञानी जीव-दया नित पालैं ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
खोज: Gyani Jeev-Daya Nit Paalain, Gyani Jiv-Daya Nit Palain