स्वाध्याय महिमा | svadhyaya mahima

संसार सागर पार करने को, सुदृढ़ नौका यही।
कषाय अटवी दग्ध करने को, दावानल है कही।। 1।।

पाप रूप उलूक को, स्वाध्याय ही मार्तण्ड है।
शान्ति सागर वृद्धि कर्त्ता, पूर्णिमा का चन्द्र है।। 2।।

मूल भेद-विज्ञान का, अरु हेतु धर्म ध्यान का।
भोगों की रुचि दूर करने, विषम ज्वर इसको कहा।। 3 ।।

शुभ गुणों के संग्रह में, भूप सम स्वाध्याय है।
इसलिए बारह तपों में, परम तप स्वाध्याय है।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १४२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’