तर्जःहे वीर तुम्हारे …
हे पार्श्व प्रभो ! तव दर्शन कर, मन में अति ही आनन्द हुआ।
निज दर्शन का उल्लास हुआ, आराधन का पुरुषार्थ हुआ ।। टेक ।।
पावन प्रतिमा जब ही देखी, पहले तो कुछ आश्चर्य हुआ।
अन्तर दृष्टि से जब देखा, जिनरूप निरख अति हर्ष हुआ ।। 1 ।।
नासा दृष्टि लखकर स्वामिन् ! अन्तर के सुख का बोध हुआ।
अपनी प्रभुता अपने में लख, मुक्ति पथ का सद्बोध हुआ ।। 2 ।।
प्रभु हाथ पै हाथ धरे लखकर, कर्तृत्व बुद्धि का नाश हुआ।
तेरी साक्षी में हे प्रभुवर, निष्काम हुआ अति तृप्त हुआ।। 3 ।।
अब स्वांग समान शरीर दिखे, चैतन्य स्वरूप प्रत्यक्ष हुआ।
अक्षय आतम वैभव देखा, जग का सब वैभव धूल हुआ ।। 4 ।।
इन्द्रादिक पद भी अपद लगें, शाश्वत निज पद का भान हुआ।
मेरा सर्वस्व सदा मुझमें, जिनराज सहज सज्ञान हुआ ।। 5 ।।
वस्तु स्वरूप की समझ हुई, हे नाथ! सहज निश्चिंत हुआ।
निरपेक्ष रहूँ, निर्ग्रन्थ रहूँ, हे देव ! सहज यह भाव हुआ।।6।।
हूँ सहज अकर्ता ज्ञाता प्रभु, स्वाधीन पने स्वीकार हुआ।
निर्द्वन्द्व रहूँ, निज साध्य लहूँ, पर भावों का परिहार हुआ ।। 7 ।।
है हृदय भक्ति से भरा विभो, चरणों में नम्रीभूत हुआ।
हो तीर्थ प्रवर्तन मंगलमय, पा जिनशासन कृतकृत्य हुआ ।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ११३ से ११४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’