तर्जः जिन गुण गाओ हर्षाओ जय-जय से नभ …
शिव सुख दायक त्रिभुवन नायक, वीर जिनेश्वर जय-जय-जय।। टेक।।
दर्शन-ज्ञान अनन्त विभो, सुख वीरज सु अनन्त प्रभो।
अक्षय प्रभुता प्रगट अहो ।। वीर. ।। 1 ।।
दोष अठारह नष्ट हुए, कामादिक निःशेष हुए।
परम ब्रह्म परमेश हुए।। वीर. ।। 2।।
धर्म तीर्थ प्रभु दर्शाया, दिव्य तत्त्व जिन समझाया।
सहज मुक्तिपथ सिखलाया ।। वीर. ।। 3 ।।
सर्व विभाव असार कहे, सारभूत निजभाव कहे।
चित्स्वरूप प्रभु परमादेय ।। वीर. ।। 4 ।।
हम तेरे अनुयायी हों, मुक्तिमार्ग के राही हों।
भाव सदा सुखदायी हों।। वीर. ।। 5 ।।
भक्ति सहित तुम नाम जपूँ, चरणों में प्रभु शीस नमूँ।
निज स्वभाव में नाथ रमूँ ।। वीर. ।। 6 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १२७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’