है परम दिगम्बर मुद्रा जिनकी । Hai Param Digambar Mudra Jinki

है परम दिगम्बर मुद्रा जिनकी, वन-वन करें बसेरा ।
मैं उन चरणों का चेरा, हो वन्दन उनको मेरा ॥
शाश्वत सुखमय चैतन्य-सदन में, रहता जिनका डेरा ।
मैं उन चरणों का चेरा, हो वन्दन उनको मेरा ॥टेक॥

जहां क्षमा मार्दव आर्जव सत्, शुचिता की सौरभ महके ।
संयम, तप, त्याग, अकिंचन स्वर, परिणति में प्रतिपल चहकें॥
है ब्रह्मचर्य की गरिमा से, आराध्य बने जो मेरा ॥1॥

अन्तर-बाहर द्वादश तप से, जो कर्म-कालिमा दहते ।
उपसर्ग परीषह-कृत बाधा, जो साम्य-भाव से सहते ॥
जो शुद्ध-अतीन्द्रिय आनन्द-रस का, लेते स्वाद घनेरा ॥2॥

जो दर्शन-ज्ञान-चरित्र-वीर्य-तप, आचारों के धारी ।
जो मन-वच-तन का आलम्बन तज, निज चैतन्य विहारी ॥
शाश्वत सुखदर्शक वचन-किरण से, करते सदा सवेरा ॥3॥

नित समता स्तुति वन्दन अरु, स्वाध्याय सदा जो करते ।
प्रतिक्रमण और प्रति-आख्यान कर, सब पापों को हरते ॥
चैतन्यराज की अनुपम निधियाँ, जिनमें करें बसेरा ॥4॥

  • पं. अभयकुमार जी, देवलाली

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