सम्यग्दर्शन मूल धर्म का, ये सर्वज्ञ उचारा है | samyagdarshana mula dharma ka ye sarvaj na uchara hai

सम्यग्दर्शन मूल धर्म का, ये सर्वज्ञ उचारा है।

प्रकट करें निज-निज परिणति में, पहला साध्य हमारा है।। 1।।

सम्यग्दर्शन बिना जगत् में, भारी दुःख उठाए हैं।
झूठे सुख में मग्न हुए, अरु भव अनंत भरमाए हैं।। 2।।

दैव योग जिनवृष पाकर भी अशुभ छोड़ शुभ में आया।
मंदराग को धर्म मानकर वीतराग पद नहीं ध्याया ।। ३।।

सच्चे देव-धर्म-गुरु का भी, रूप न सच्चा पहिचाना।
सच्चे तत्त्व का मर्म न जाना, भेद-विज्ञान नहिं ठाना।। 4।।

देह को अपना माना है, उसमें ही सुख खोजा निशदिन ।
मिथ्या भोगों में सुख माना, उनमें लीन रहा-निशदिन ।। 5 ।।

दूर हुआ मिथ्यात्व न अब तक, इससे दुःख ही उपजाया।
बाह्य ज्ञान अरु क्रियाकाण्ड से भी सुख नहीं पाया।। 6।।.

अंश मात्र मिथ्यात्व बुरा है सत्य ज्ञानियों ने गाया है।
आज हुई मम अन्तर्दृष्टि, निज ज्ञायक का भान हुआ है ।। 7 ।।

भाव शुभाशुभ दुःखमय भासे, निजानंद निज में पाया।
अन्य नहीं कुछ मुझे सुहावे, एक मात्र ज्ञायक भाया।। 8 ।।

अब तो यही भावना मेरी, सदा आत्मा ही ध्याऊँ।
छोड़ सकल जग द्वन्द्व-फन्द बस निज स्वरूप में रम जाऊँ ।।9।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३८१ से ३८२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’