हे पार्श्व प्रभो शिवदाता | He Parshva Prabho Shivdata

तर्ज: मन भज ले श्री भगवान्, उमरिया रह गई थोड़ी …

हे पार्श्व प्रभो शिवदाता, मेटो मम सर्व असाता ।। टेक ।।

लोकोत्तम पद प्रगट किया ध्रुव ध्यान अविकार ।
वीतराग सर्वज्ञ हुए मंगलमय मंगलकार ।।
निरपेक्ष विश्व के ज्ञाता ।। 1 ।।

हुआ कमठ भी नत हे स्वामी समता देख तुम्हारी ।
इष्ट-अनिष्ट कल्पना नाशे यही भावना म्हारी ।।
रत्नत्रय तीर्थ विख्याता ।। 2 ।।

टूटे विभाव अयोध्या का सुनकर प्रभु हुए बाल ब्रह्मचारी ।
भव दुखों से व्यथित चित्त होऊँ चैतन्य-विहारी ।।
विभु ! यही भाव उमगाता ।। 3 ।।

किया परम उपकार जिनेश्वर दिव्य तत्व दर्शाया ।
भाव भासना हुई सहज ही मिथ्या मोह पलाया ।।
चरणों में शीश नवाता ।। 4 ।।

आराधूँ कारण परमातम आवागमन मिटाऊँ ।
तृप्त रहूँ संतुष्ट रहूँ प्रभु सम निज प्रभुता पाऊँ ।।
जग में कुछ अन्य न भाता ।। 5 ।।

Artist: ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’


स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ ११२ से ११३