हे जिनराज बरसे
हे जिनराज बरसे आनन्द अपार
तुमरी छवि से झलकता है आतम प्रकाश
दिखलाते निज तत्त्व सार होऽऽऽऽ
हे जिनराज निज में मगन, करते निजातम में रमण ।
जिनवाणी है अमृतमयी, करवाती सबको भव जयी ।।
तुम ही हो ज्ञान में, तुम ही हो ध्यान में,
तुमको है शत नमन, करता हूँ बारबार ।।1।। हे जिनराज… ।।
निज में ही निज को निहारते, आतम द्रव्य प्रकाशते ।
निज में ही सागर शांति का, निज में ही सागर सुख भरा ।
निज में ही, निज बसे, कर्म मैल सब नशे,
निज में ही लीन हो, नश जाए सब विकार ।।2।। हे जिनराज… ।।
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ६२ से ६३