स्वयं सिद्ध शुद्धात्मा महिमा अपरम्पार रे
स्वयं सिद्ध शुद्धात्मा महिमा अपरम्पार रे ।
सहज मुक्त परमात्मा महिमा अपरम्पार रे ।।टेक।।
अनाहारी शुद्धात्मा सहज तृप्त सुखकार रे ।
अविहारी शुद्धात्मा सहज अचल अविकार रे ।।1।।
शाश्वत वैभववान प्रभु, सुख स्वरूप सुखकार रे ।
सहज चतुष्टयवान प्रभु, साँचा तारणहार रे ।।2।।
ध्रुव अनुपम शुद्धात्मा, परभावों के पार रे ।
निष्क्रिय ज्ञायक आत्मा, स्वयं स्वयं में सार रे ।।3।।
सहज हुआ कृतकृत्य हुआ, आनन्द अपरम्पार रे ।।4।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ९८