ज्ञान ज्ञेयमाहिं नाहिं, ज्ञेय हू न ज्ञानमाहिं
ज्ञान ज्ञेयमाहिं नाहिं, ज्ञेय हू न ज्ञानमाहिं ज्ञान ज्ञेय आन आन, ज्यों मुकर घट है ॥ ज्ञान. ॥
ज्ञान रहै ज्ञानीमाहिं, ज्ञान बिना ज्ञानी नाहिं,
दोऊ एकमेक ऐसे, जैसे श्वेत पट है ॥ ज्ञान. ॥ १ ॥
ध्रुव उतपाद नास, परजाय नैन भास,
दरवित एक भेद, भावको न ठट है ॥ ज्ञान. ॥ २ ॥
‘द्यानत’ दरब परजाय विकलप जाय,
तब सुख पाय जब, आप आप रट है ॥ ज्ञान. ॥ ३ ॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ६६
अर्थ
हे ज्ञानी। ज्ञेय अर्थात् जानने योग्य वस्तुओं में स्वयं में ज्ञान नहीं होता/जाता। इस ही भाँति ज्ञान में ज्ञेय नहीं होता। ज्ञान और ज्ञेय दोनों अलग-अलग हैं। जैसे घट व दर्पण दोनों अलग-अलग हैं। जैसे दर्पण में घट का प्रतिबिम्ब झलकता है घट उस दर्पण में नहीं होता, दर्पण और घट अलग-अलग हैं, उसी प्रकार ज्ञान में ज्ञेय झलकता है, ज्ञेय ज्ञान में नहीं जाता। ज्ञानी अलग है और ज्ञेय अलग है। ज्ञान ज्ञानी में रहता है। बिना ज्ञान के ज्ञानी नहीं होता। दोनों ऐसे एकमेक हैं जैसे कोई श्वेत उज्ज्वल वस्त्र होता है, वस्त्र और उसका श्वेतपना एकमेक होता है। उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य, ये पर्यायें आँखों से दिखाई देती हैं। ये द्रव्य के हो भेद हैं, भावों की रचना नहीं है। द्यानतराय कहते हैं कि द्रव्य और उसकी पर्याय का विकल्प छूट जाए अर्थात् दोनों समग्र दीखें तब सुख का अनुभव होता है और स्व मात्र स्व रह जाता है।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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