हम न किसी के कोई न हमारा, झूठा है जग का ब्योहारा…
तन सम्बन्धी सब परिवारा, सो तन हमने जाना न्यारा ॥ टेक ॥
पुण्य उदय सुख का बढ़वारा, पाप उदय दुख होत अपारा।
पाप-पुण्य दोऊ संसारा, मैं सब देखन जाननहारा ॥1 ॥
मैं तिहुँ जग तिहुँ काल अकेला, पर संजोग भया यह मेला।
थिति पूरी करि खिर-खिर जांहीं, मेरे हर्ष शोक कछु नाहीं ॥2॥
राग भावतैं सज्जन मानैं, दोष भावतैं दुर्जन जानै ।
राग दोष दोऊ मम नाहीं, ‘द्यानत’ मैं चेतनपद माही ॥3॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १७५
अर्थ
पुण्योदय होता है तो सुख की वृद्धि होती है। पाप का उदय होता है तो अपार (जिसका कोई पार नहीं होता) दुःख उत्पन्न होता है। पाप और पुण्य ये दोनों ही क्रियाएँ संसार की हैं, मैं तो इन सबका दृष्टा मात्र हूँ, देखनेवाला हूँ।
मैं तीन लोक में, तीन काल में सदा अकेला हूँ। पर के संयोग के कारण यह (पारिवारिक) मेला-सा जुट गया है। जैसे-जैसे इसकी स्थिति पूरी होती जाती है, ये सब संयोग विघटते जाते हैं, खिर जाते हैं, खत्म होते जाते हैं इसलिए इन संयोगों के प्रति मेरे न कोई हर्ष है और न मेरे कोई शोक है, न विषाद है।
राग-भाव के कारण अपनापन होता है, जिसके कारण प्राणी अपना समझा व कहा जाता है, सज्जन व भला आदमी समझा व जाना जाता है। और बैरभाव के कारण वह दुष्ट गिना जाता है। परन्तु न तो यह राग-भाव मेरा है और न यह द्वेष-भाव ही मेरा है। द्यानतराय कहते हैं कि मेरा तो यह चेतनपद है, जो इन दोनों (राग-द्वेष) से भिन्न है वह ही मेरा अपना है।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।
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