तर्जः धन्य-धन्य आज घड़ी कैसी सुखकार है …
बाहुबली की शान्त मुद्रा कैसी सुखकार है।
रोम-रोम से शान्ति झलकती, प्रभुता अपरम्पार है।। टेक।।
जग का वैभव छोड़ आपने, निज का वैभव पाया है।
आत्म ध्यान की अग्नि जलाकर, कर्म समूह जलाया है।।
हुए प्रभो ! निष्कर्म निरंजन, दर्श मंगलकार है।। 1।।
ऋषभ देव से प्रथम सिद्धपद, प्रभो आपने पाया है।
सिद्ध समान सहज शुद्धातम, उपादेय दर्शाया है।।
परभावों से शून्य आत्मा, मुक्ति का आधार है।। 2।।
सहज ज्ञानमय प्रभुता प्रभुवर, आज समाई अन्तर में।
अचल ध्यानमय मूरति स्वामिन्, आज बसी मेरे उर में ।।
प्रभु प्रसाद से जाना मैंने, अपना जाननहार है।। 3।।
भक्ति विभोर हुआ हे प्रभुवर चरणों शीस नवाता हूँ।
ज्ञानमयी वैराग्य भावना, अहो जिनेश्वर भाता हूँ।।
हुआ उदास चित्त विषयों से, आनन्द अपरम्पार है।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १३५ से १३६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’