सम्यग्दर्शन माहात्म्य | samyagdarshana mahatmya

सम्यग्दर्शन बिना जगत् में, सुख नहीं मिल पायेगा।

केवल दुःख ही दुःख मिलेगा, दूर सुख से जायेगा।। 1।।

या यों कहिए सम्यग्दर्शन, मूल सुख सम्पद का है।
इसके बिना व्यर्थ सब जप-तप हेतु सभी आपद का है ।। 2 ।।

सम्यग्दर्शन बिना जगत् में काल अनादि गँवाया है।
मुनिव्रत भी धारा है मैंने, पर ग्रैवयक उपजाया है।। 3।।

अपने आत्म के भान बिना, पर को निज, निज पर माना है।
तन से भी अत्यन्त भिन्न मैं, किया न यह विज्ञाना है।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३७७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’