तर्ज : पारस प्रभु हे पारस प्रभो …
शान्ति प्रभो, शान्ति प्रभो,
शान्ति प्रदाता, शान्ति प्रभो।
जय बोलो श्री शान्ति प्रभो,
जय-जय बोलो शान्ति प्रभो ।। टेक ।।
चक्रवर्ती पद धूल समझकर,
क्षण भर में प्रभुवर त्यागा।
रहित अडम्बर होय दिगम्बर,
प्रभुवर निज पद आराधा।।
प्रगटा केवलज्ञान अहो।। 1।।
अक्षय सुख का मार्ग जिनेश्वर,
दिव्यध्वनि में दर शाया।
जगत् विभूति असार बताई,
सारभूत निजपद गाया।।
आनन्दमय हुए भव्य विभो।। 2।।
अनुपम मूरति देख प्रभु की,
अहो ! हृदय हर्षाया है।
कैसे गावें गुण अनन्त प्रभु,
भक्तिभाव उमगाया है ।।
चरणों शीस नवायें अहो ।। 3 ।।
झूठे सुख के साधन तजकर,
निज स्वभाव साधन द्वारा।
प्रभो ! आपके पथ पर चलकर,
सुख पावें अपरम्पारा ।।
सहज सिद्ध पद पावें प्रभो ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ९८ से ९९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’