ज्ञान की चांदनी जिसके | gyan ki chandni jiske

ज्ञान की चांदनी जिसके मन में खिली ।
उसके अज्ञान का सब अंधेरा गया ।
चेतना आज जागी खिला मन कमल |
मुक्ति कन्या से उसका तिलक हो गया।।

आज जीवन हुआ कितना निर्भर सा ।
मानो बेटी विदाई से फुर्सत हुआ।
बेटे सब पैर पर अपने-अपने खड़े।
सारी चिंता का तम्बू कहाँ उड़ गया।

सबकी चलती दुकानें दिखी इस तरह
बात करने किसी को है फुर्सत नहीं ।
मैं भी क्यों देखू पतरी पराई वृथा।
अपने घर खीर-खाजे से थाली सजी।

शांत संगीत मुझको सुहाता है अब।
भागने दौड़ने की जरूरत नहीं।।
मैं तो हूँ साहूकारों की भांति अचल |
एफ. डी. में सुरक्षित मेरा धन डबल।।

कार्य होता उपादान से क्या है शक ?
और अनुकूल मिलते निमित्त भी सभी
दोनों मौजूद चिंता है किस बात की ।
तुम तो आनंद बंशी बजाओ अभी।।