हे वीर प्रभूजी हम पर, अनुपम उपकार तुम्हारा | He Veer Prabhuji Hum Par, Anupam Upkar Tumhara

हे वीर प्रभूजी हम पर, अनुपम उपकार तुम्हारा

हे वीर प्रभूजी हम पर, अनुपम उपकार तुम्हारा ।
तुमने दिखलाया हमको, शुद्धातम तत्त्व हमारा ॥
हम भूले निज वैभव को, जड़-वैभव अपना माना।
अब मोह हुआ क्षय मेरा, सुनकर उपदेश तुम्हारा ॥

तू जाग रे चेतन प्राणी, कर आतम की अगवानी।
जो आतम को लखते हैं उनकी है अमर कहानी ॥टेक ॥

है ज्ञान मात्र निज ज्ञायक, जिसमें है ज्ञेय झलकते ।
यह झलकन भी ज्ञायक है, इसमें नहीं ज्ञेय महकते ॥
मैं दर्शन ज्ञान स्वरूपी, मेरी चैतन्य निशानी ॥१॥

अब समकित सावन आया, चिन्मय आनन्द बरसता ।
भीगा है कण कण मेरा, हो गई अखण्ड सरसता ॥
समकित की मधु चितवन में, झलकी है मुक्ति निशानी ॥२॥

ये शाश्वत भव्य जिनालय, है शान्ति बरसती इनमें ।
मानो आया सिद्धालय, मेरी बस्ती हो उसमें ॥
मैं हूँ शिवपुर का वासी, भव भव की खतम कहानी ॥३॥


स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ७९ (विभिन्न कवियों के भजन)

खोज: He Vir Prabhuji Hum Par, Anupam Upkar Tumhara