हम सब ही मिलकर मंगलमय,
श्री रक्षाबंधन पर्व पर संकल्प करेंगे।
जिनशासन की रक्षा का हम संकल्प करेंगे ॥ टेक ॥
जो आत्म घातक मोह रागादिक अरे परिणाम ।
हैं भव भ्रमण के कारण, क्लेश देते आठों याम ॥
इन दुर्भावों के नाश का संकल्प करेंगे ॥ 1 ॥
परमार्थ देव-शास्त्र-गुरुवर का करें श्रद्धान।
मंगलमयी परमार्थ धर्म की करें पहिचान ॥
अविछिन्न भेदज्ञान का संकल्प करेंगे ॥ 2 ॥
अज्ञान वश देहादि में नहीं मग्न रहेंगे।
विषयों के लक्ष्य से नहीं कषाय करेंगे ॥
अब स्वानुभव प्रगटाने का संकल्प करेंगे ॥ 3 ॥
पर को ही दुःख का कर्त्ता मान, क्रोध नहीं करें।
अपने को पर का कर्त्ता मान, मान नहीं करें ।।
ज्ञाता अकर्त्ता लखने का संकल्प करेंगे ॥ 4 ॥
निज ज्ञान वैभव से सतत् आराधना करें।
जड़ बाह्य वैभव से अहो प्रभावना करें।।
सर्वस्व समर्पण का सत् संकल्प करेंगे ॥ 5॥
कुरीतियों का उन्मूलन, हम ज्ञान से करें।
निज आचरण से धर्म का प्रसार हम करें ॥
सम्यक् रत्नत्रय मार्ग का संकल्प करेंगे ॥। 6॥
हो अपने कष्टों की हमें परवाह ही नहीं।
साधर्मी के कष्टों प्रति बे-परवाह हों नहीं ॥
निज-पर कल्याण का अहो संकल्प करेंगे ॥ 7 ॥
अब आत्मा को जाना हमने सबसे ही न्यारा।
समतामयी यह धर्म हमको प्राणों सा प्यारा ॥
निर्ग्रन्थ पथ में बढ़ने का संकल्प करेंगे ॥ 8 ॥
अब भायें तत्त्व भावना, निरपेक्ष नित रहें।
आया अवसर नहीं क्षण भर भी प्रमाद हम करें ॥
अब सम्यक् आत्म-ध्यान का संकल्प करेंगे ॥ ९ ॥
संकल्प के बिना अनेक होते हैं विकल्प।
आकुलता रहती जीव तब तक हो न निर्विकल्प ॥
ज्ञायक हैं ज्ञायक रहने का संकल्प करेंगे ॥ 10 ॥
सम्यक् पुरुषार्थ से परम साध्य को पायें।
जिनमार्ग पाया अब नहीं भव-भव में भ्रमायें ॥
ध्रुव सिद्ध पद पायें यही संकल्प करेंगे ॥ 11 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’