सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल | Sab Mil Dekho Heli Mhari He Trisalabal Vadan Rasal

सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल

सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल ।।टेक।।

आये जुतसमवसरन कृपाल, विचरत अभय व्याल मराल,
फलित भई सकल तरूमाल ।।१।।सब. ।।

नैन न हाल भृकुटी न चाल, वैन विदारै विभ्रम जाल,
छवि लखि होत संत निहाल ।।२।।सब. ।।

वंदन काज साज समाज, संग लिये स्वजन पुरजन व्राज,
श्रेणिक चलत है नरपाल ।।३।।सब. ।।

यों कहि मोदजुत पुरबाल, लखन चाली चरम जिनपाल,
‘दौलत’ नमत धर धर भाल ।।४।।सब. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १०७

अर्थ

हे मेरी सहेलियो ! आओ, सब मिलकर त्रिशला माता के पुत्र के सुन्दर मुख को देखो।

त्रिशला माता के पुत्र अर्थात् श्री महावीर भगवान बड़े कृपालु हैं। वे आज समवशरण-सहित यहाँ पधारे हैं और उनके निकट साँप एवं हाथी आदि पशु भी निर्भयतापूर्वक विचरण कर रहे हैं। उनके आगमन से सभी ऋतुओं के वृक्ष भी फलीभूत हो गये हैं।

उनके नेत्र हिलते नहीं हैं, उनकी भौहें भी चंचल नहीं होती हैं, उनके वचन भ्रमरूपी जाल को काट फेंकते हैं और सन्त पुरुष उनकी मुद्रा को देखकर निहाल हो जाते हैं।

भगवान की वन्दना के लिए राजा श्रेणिक अपने समस्त स्वजनों, नगरजनों एवं स्त्रियों के समूह को साथ लेकर चल रहा है।

कविवर दौलतराम कहते हैं कि नगर की स्त्रियाँ इसप्रकार की बातें कहती हुई हर्षित होकर अन्तिम तीर्थंकर श्री महावीर भगवान को देखने चल दीं। मैं भी उनको हाथ जोड़कर, मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।

स्रोत: महावीर पदावली, पद 22।

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