सिद्धचक्र की स्तुति (पं. मक्खनलाल) | Siddhachakra Ki Stuti (Pt. Makkhanlal)

सिद्धचक्र की स्तुति (पं. मक्खनलाल) | Siddhachakra Ki Stuti (Pt. Makkhanlal)

श्री सिद्धचक्र का पाठ करो, दिन आठ,
ठाठ से प्रानी, फल पायो मैना रानी ।।टेक।।

मैना सुन्दरि इक नारी थी, कोढ़ी पति लख दुखियारी थी,
नहिं पड़े चैन दिन रैन व्यथित अकुलानी ।।फल पायो०
जो पति का कष्ट मिटाऊँगी, तो उभय लोक सुख पाऊँगी,
नहिं अजा-गल-स्तन-वत निष्फल जिन्दगानी ।। फल पायो०
एक दिवस गई जिन मन्दिर में, दर्शन कर अति हर्षी उरमें,
फिर लखे साधु निर्ग्रन्थ दिगम्बर ज्ञानी ।। फल पायो०
बैठी कर मुनिको नमस्कार, निज निन्दा करती बार बार,
भर अश्रु नयन कहि मुनि सो दुखद कहानी ।। फल पायो०
बोले मुनि पुत्री धैर्य धरो, श्री सिद्धचक्र का पाठ करो,
नहिं रहे कुष्ठ की तन में नाम निशानी ।। फल पायो०
सुन साधु वचन हर्षी मैना, नहिं होंय झूठ मुनि के बैना
करके श्रद्धा श्री सिद्धचक्र की ठानी ।। फल पायो०
जब पर्व अठाई आया है, उत्सव युत पाठ कराया है,
सब के तन छिड़का यंत्र न्हवन का पानी ।। फल पायो०
गंधोदक छिड़कत वसु दिनमें, नहिं रहा कुष्ठ किंचित तनमें,
भई सात शतक की काया स्वर्ण समानी ।। फल पायो०
भव-भोग भोगि योगीश भये, श्रीपाल कर्म हनि मोक्ष गये,
दूजे भव मैना पावे शिव रजधानी ।। फल पायो०
जो पाठ करे मन वच तन से, वे छूट जायं भव बन्धन से,
‘मक्खन’ मत करो विकल्प कहे जिनवाणी ।। फल पायो०


Artist: पं० मक्खनलाल जी देहली
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ३९६